रूस का बड़ा रक्षा प्रस्ताव: Su-57E और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से भारत की हवाई ताकत को नई दिशा
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वैश्विक भू-राजनीति के बीच भारत और रूस की रक्षा साझेदारी एक नए मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। दिसंबर में होने वाली रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा से पहले ही मॉस्को ने भारत को पांचवीं पीढ़ी के Su-57E लड़ाकू विमान का ऑफर दिया है। यह प्रस्ताव केवल विमान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बिना शर्त तकनीकी हस्तांतरण, लाइसेंस प्राप्त उत्पादन और लंबे समय तक मेंटीनेंस की गारंटी भी शामिल है।
मेक इन इंडिया के लिए सबसे बड़ा मौका
भारतीय वायुसेना पहले ही 114 राफेल फाइटर जेट्स को देश में बनाने का प्रस्ताव रख चुकी है। लगभग 2 लाख करोड़ की यह डील मेक इन इंडिया के तहत सबसे बड़ी रक्षा सौदा होगी। ऐसे में रूस का Su-57E ऑफर भारत को एक वैकल्पिक और रणनीतिक विकल्प देता है। यदि यह डील होती है तो भारत न केवल अपनी हवाई ताकत को बढ़ाएगा, बल्कि घरेलू रक्षा उत्पादन को भी नई ऊंचाई पर ले जाएगा।
Su-57 बनाम F-35: वैश्विक शक्ति संतुलन
रूसी Su-57 जेट्स को अमेरिका के F-35 का जवाब माना जाता है। दोनों ही पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं, जिन्हें दुश्मन के रडार को चकमा देने के लिए डिजाइन किया गया है। रूस का दावा है कि Su-57 की तकनीक पर कोई रोक नहीं होगी – इंजन, रडार, स्टेल्थ तकनीक और आधुनिक हथियारों की जानकारी भारत को दी जाएगी। यहां तक कि भारत चाहे तो इन विमानों का उत्पादन देश में ही किया जा सकता है।
रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय
रूस ने भारत को टू-सीटर Su-57 बनाने की जॉइंट प्लानिंग का भी प्रस्ताव दिया है। इसके साथ ही दस से अधिक नए हथियारों का लाइसेंस प्राप्त उत्पादन और भारतीय मूल के हथियारों को Su-57E में इंटीग्रेट करने की पेशकश भी की गई है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में मॉस्को का दौरा किया और पुतिन से मुलाकात की।
दशकों पुराना भरोसा
भारत और रूस की रक्षा साझेदारी कोई नई कहानी नहीं है। जब भारत पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे थे, तब भी रूस ने हथियारों की सप्लाई जारी रखी थी। फाइटर जेट्स, सबमरीन, मिसाइल सिस्टम और हेलिकॉप्टर्स – रूस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद सप्लायर रहा है। Su-57E का ऑफर इस रिश्ते को और गहरा करने का संकेत है।
राफेल बनाम Su-57E: भारत की सामरिक स्वतंत्रता का निर्णायक मोड़
भारत के सामने अब एक अहम रणनीतिक विकल्प है। एक ओर फ्रांस के साथ राफेल डील है, जो मेक इन इंडिया के तहत सबसे बड़ी रक्षा परियोजना बन सकती है। दूसरी ओर रूस का Su-57E ऑफर है, जिसमें बिना शर्त तकनीकी हस्तांतरण और घरेलू उत्पादन की संभावना है।
यह केवल रक्षा सौदे का मामला नहीं है, बल्कि भारत की सामरिक स्वतंत्रता और वैश्विक शक्ति संतुलन में उसकी भूमिका का भी संकेत है। यदि भारत इस अवसर का लाभ उठाता है, तो आने वाले वर्षों में उसकी हवाई ताकत न केवल एशिया बल्कि वैश्विक स्तर पर नई परिभाषा गढ़ सकती है।


