संविधान के 75 वर्ष : कला, स्वतंत्रता और मर्यादाओं पर IGNCA में विचारोत्तेजक संगोष्ठी सम्पन्न

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2/10/20261 min read

प्रस्तावना : संविधान और कला का संगम

नई दिल्ली, 10 फरवरी 2026– भारतीय संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। विषय था – “कला अभिव्यक्ति : स्वतंत्रता एवं मर्यादाएँ”। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार और संस्कार भारती दिल्ली प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी ने कला, साहित्य, संगीत और सिनेमा के विविध आयामों पर गहन विमर्श का अवसर प्रदान किया।

उद्घाटन : स्वागत और प्रस्तावना

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्कार भारती दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष प्रभात कुमार के स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने संविधान की यात्रा और कला की भूमिका को जोड़ते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की।

प्रथम सत्र : साहित्य और अभिव्यक्ति

पहला सत्र साहित्य पर केंद्रित रहा। IGNCA के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अलका सिन्हा और लेखक व्योमेश शुक्ल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्संबंध पर विचार रखे। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि साहित्य की शक्ति तभी सार्थक है जब वह समाज के प्रति जिम्मेदार हो।

द्वितीय सत्र : दृश्य कला और सौंदर्यबोध

दूसरे सत्र में मूर्तिकार नीरज गुप्ता, ललित कला अकादेमी के उपाध्यक्ष डॉ. नंदलाल ठाकुर और आंतरिक सज्जाकार सीतू कोहली ने कला में संवेदनशीलता, लोकमर्यादा और सौंदर्यबोध की महत्ता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि दृश्य कला केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी वाहक है।

तृतीय सत्र : प्रदर्शनकारी कलाओं का संवाद

तीसरे सत्र में संगीत नाटक अकादेमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा, बाँसुरी वादक श्री चेतन जोशी और गायिका सुश्री विद्या शाह ने परंपरा और नवाचार के बीच संतुलन पर विचार साझा किए। उन्होंने आधुनिक चुनौतियों के बीच भारतीय प्रदर्शनकारी कलाओं की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

चतुर्थ सत्र : सिनेमा और सामाजिक प्रभाव

चौथे सत्र में फिल्म निर्देशक अतुल पांडेय, पत्रकार अनंत विजय और समीक्षक मुरतजा खान ने सिनेमा की अभिव्यक्ति की सीमाओं और उसके सामाजिक प्रभावों पर विमर्श किया। वक्ताओं ने कहा कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण भी है।

समापन : कला और उत्तरदायित्व

अंतिम सत्र में संस्कार भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री अभिजीत गोखले ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र और संविधान प्रदत्त अधिकारों एवं कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि कला की स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी हो।

विशेष आकर्षण : नाटक और प्रदर्शनी

संगोष्ठी की विशेषता रही कि प्रत्येक सत्र से पूर्व विषय बोध कराने हेतु नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किए गए। साथ ही भारतीय संविधान की महिला शिल्पियों के योगदान और संविधान में निहित कला पक्ष को दर्शाती चित्र प्रदर्शनी भी आयोजित हुई।

आत्ममंथन और प्रेरणा

कार्यक्रम के संचालक भूपेंद्र कौशिक ने कहा कि यह संगोष्ठी संविधान की 75 वर्षों की यात्रा को कला के माध्यम से समझने और आत्ममंथन करने का सार्थक प्रयास है। बड़ी संख्या में कलाकारों, कलाधर्मियों, छात्र–छात्राओं और संस्कार भारती के कार्यकर्ताओं की सहभागिता ने इसे एक प्रेरक और ऐतिहासिक आयोजन बना दिया।